Sapta Badri Yatra

उत्तराखंड के सप्त बद्री मंदिर की यात्रा

Sapta Badri Yatra

सप्त बद्री सात पवित्र मंदिरों का एक समूह है जो भगवान विष्णु या रक्षक ईश्वर को समर्पित है। सप्त बद्री मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित हैं। अधिकांश मंदिर अलकनंदा नदी घाटी क्षेत्र में स्थित हैं जो बद्रीनाथ के उत्तर में सतोपंथ से लेकर चमोली जिले के नंदप्रयाग तक फैले हुए हैं। इन सभी क्षेत्रों को भगवान विष्णु के निवास स्थान के रूप में जाना जाता है।

सप्त बद्री समूहों में बद्रीक्षेत्र में 3133 मीटर की ऊँचाई पर स्थित बद्रीनाथ तीर्थ सबसे प्रमुख मंदिर हैं। सप्त बद्री सर्किट के अन्य मंदिर हैं- ध्यान बद्री, अर्ध बद्री, आदि बद्री, भविष्य बद्री, योगध्यान बद्री और वृद्ध बद्री। इनके साथ साथ विष्णु मंदिर नरसिंह बद्री भी है जो बद्री क्षेत्र में आठवां मंदिर है। इन्हीं में से 5 मंदिरों को मिलकर एक और समूह बनता है जिसमें केवल पाँच मंदिर शामिल हैं, बद्रीनाथ मंदिर, ध्यान बद्री, वृद्ध बद्री, योग बद्री, और भविष्य बद्री।

सप्त बद्री मंदिर, भगवान विष्णु के सात उल्लेखनीय मंदिरों की यात्रा है, जिनकी उत्पत्ति महाभारत में वर्णित पौराणिक कथाओं के अनुसार हुई है। कुछ मंदिर पूरे वर्ष खुले रहते हैं , जबकि बद्रीनाथ मंदिर और भव्य बद्री मंदिर केवल छह महीने के लिए खुलते हैं। सर्दियों के महीनों के दौरान बर्फबारी और मौसम की स्थिति अनुसार ये दोनों मंदिर बंद कर दिए जाते हैं ।

 

आदि बद्री मंदिर

आदि बद्री मंदिर को पंच बद्री के साथ-साथ उत्तराखंड में स्थित विष्णु मंदिरों के सप्त बद्री में भी स्थान दिया गया है । यह उत्तराखंड के चमोली जिले में पिंडर नदी और अलकनंदा नदी के संगम पर स्थित है। मंदिर आदि बद्री गुप्त काल के दौरान बनाया गया था और इसे वास्तुकला की सुंदर ईंट शैली के लिए जाना जाता है। किंवदंती के अनुसार, यह माना जाता है कि भगवान विष्णु ने सतयुग, त्रेता और द्वापरयुग में इस स्थान को अपना निवास स्थान बनाया था। ऐसा भी माना जाता है कि कलयुग में विष्णु बद्रीनाथ में स्थानांतरित हो गए। इसलिए इस स्थान का नाम आदि बद्री (प्राचीन बद्री) रखा गया है।

एक अन्य किंवदंती यह है कि महाऋषि वेद व्यास द्वारा लिखित श्री मद भागवत पुराण को यहाँ लिखा गया था। इस मंदिर का प्राचीन नाम “नारायण मठ” था | यह मंदिर कर्णप्रयाग से लगभग 16 किलोमीटर दूर 16 प्राचीन मंदिरों का एक समुह है लेकिन वर्तमान समय में केवल 16 मंदिर में से 14 ही बचे है | आदिबद्री मंदिर का आकर पिरामिड रूप की तरह है | मंदिर के पुजारी दक्षिण भारत के ब्राह्मण हैं।

आदि बद्री मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → आदि बद्री (एनएच- 109 पर 17 किलोमीटर)

बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनाथ मंदिर या बद्री विशाल को सप्त बद्री मंदिर परिसर का सबसे प्रमुख मंदिर माना गया है। चमोली जिले में 3,133 मीटर (10,279 फीट) की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु का प्रमुख निवास है। बद्रीनाथ का सुंदर शहर मंदिर के कारण विकसित हुआ और एक आदर्श स्थान है जहाँ आस्था और प्रकृति अद्भुत मिश्रण बनाते हैं। यह भगवान विष्णु को समर्पित 108 मंदिरों में से एक है, जिसे दिव्य देशम के रूप में जाना जाता है।

वैदिक शास्त्रों में, बद्रीनाथ का बहुत जगह पर उल्लेख है। यह माना जाता है कि पहले बद्रीनाथ एक बौद्ध मठ था जिसे आदि शंकराचार्य ने 8 वीं शताब्दी में हिंदू मंदिर में बदल दिया। एक अन्य मान्यता यह भी है कि आदि शंकराचार्य छः वर्षों तक (८१४ से ८२० तक) इसी स्थान पर रहे थे। इस स्थान में अपने निवास के दौरान वह छह महीने के लिए बद्रीनाथ में, और फिर शेष वर्ष केदारनाथ में रहते थे। हिंदू अनुयायियों का कहना है कि बद्रीनाथ की मूर्ति देवताओं ने स्थापित की थी। जब बौद्धों का पराभव हुआ, तो उन्होंने इसे अलकनन्दा में फेंक दिया। शंकराचार्य ने ही अलकनंदा नदी में से बद्रीनाथ की इस मूर्ति की खोज की, और इसे तप्त कुंड नामक गर्म चश्मे के पास स्थित एक गुफा में स्थापित किया।

एक और कथा है बद्रीविशाल से सम्बंधित जो बताती है की भगवान विष्णु इस क्षेत्र में घोर तपस्या में लीन थे, तो हिमपात के कारण भगवान विष्णु बर्फ से ढकने लगे उन्हें हिमपात से बचाने के लिए देवी लक्ष्मी ने उनके समीप ही बद्री वृक्ष का रूप ले लिया और भगवान विष्णु पर पड़ने वाले हिमपात को देवी लक्ष्मी अपने ऊपर सहती रही। जब भगवान विष्णु का तप समाप्त हुआ तो देवी लक्ष्मी की सेवा और समर्पण से प्रसन्न होकर उन्होंने उन्हें वरदान दिया के आज से उन्हें देवी लक्ष्मी के साथ इसी स्थान पर पूजा जायेगा चूँकि देवी लक्ष्मी ने बद्री वृक्ष का रूप लिया था तो इसी कारणवश यहाँ भगवान विष्णु बद्रीविशाल नाम से प्रसिद्ध हुए।

हर साल बद्रीनाथ मंदिर अप्रैल के अंतिम सप्ताह या मई की शुरुआत में खुलता है। मंदिर नवंबर तक खुला रहता है। शेष छह महीनों में  अत्यधिक ठंडे मौसम के कारण यहाँ पहुंचना दुर्गम होता है।कपाट बंद होने पर डोली यात्रा के माध्यम से सर्दियों के मौसम के दौरान, भगवान विष्णु को पांडुकेश्वर गांव में योगध्यान बद्री मंदिर तक ले जाया जाता है। उत्तराखंड में स्थित चार धाम मंदिर समूहों में बद्रीनाथ मंदिर एक है।

बद्रीनाथ मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → चमोली (33 किलोमीटर) → जोशीमठ (29 किलोमीटर) → बद्रीनाथ (46)

योगध्यान बद्री मंदिर

Mahakali Devi Shaktipeetha

सप्त बद्री मंदिरों में अगला प्रमुख मंदिर चमोली जिले में स्थित योगध्यान बद्री मंदिर है। पांडुकेश्वर गांव में बसे इस मंदिर में भगवान विष्णु की ध्यान मुद्रा को दर्शाया गया है। 1,829 मीटर (6,001 फीट) की ऊंचाई पर स्थित, योगध्यान बद्री मंदिर अलकनंदा नदी पर गोविंद घाट के किनारे पर है। यह बद्रीनाथ से लगभग 24 किलोमीटर दूर है और बद्रीनाथ मंदिर जितना ही पुराना माना जाता है।

योगध्यान बद्री मंदिर भगवान बद्रीनाथ का शीतकालीन आवास है। जब शीतकाल के लिए बद्रीनाथ मंदिर के द्वार बंद हो जाते हैं, तो बद्रीनाथ की मूर्ति को यहां लाया जाता है। यहां पर भगवन विष्णु के भाई के साथ ही कुबेर देवता की भी पूजा की जाती है।

योगध्यान बद्री मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → चमोली (33 किलोमीटर) → जोशीमठ (29 किलोमीटर) → विष्णुप्रयाग (13 किलोमीटर) -योगध्यान बद्री, पांडुकेश्वर

भविष्य बद्री मंदिर

भविष्य बद्री को भगवान विष्णु के भविष्य का निवास माना जाता है और यह उत्तराखंड में चमोली जिले के सुभान गांव में स्थित है। मंदिर 2,744 मीटर (9,003 फीट) की ऊंचाई पर है और साल्धार गांव से छह किलोमीटर की पैदल यात्रा के माध्यम से यहाँ पहुँचा जा सकता है। भविष्य बद्री मंदिर से नंदादेवी चोटियों और पास ही बहने वाली धौलीगंगा नदी का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है।

किंवदंती के अनुसार, यह माना जाता है कि जब दुनिया में बुराई की अति हो जाएगी, जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में रखी मूर्ति जब खंडित हो जायेगी तो बद्रीनाथ का मंदिर भी नहीं रहेगा और भगवान बद्रीविशाल, भविष्य बद्री मंदिर में स्थान्तरित हो जायेंगे। भविष्य बद्री मंदिर आने वाले समय में भगवान बद्री विशाल का पूजन स्थान होगा। इससे बद्रीनाथ का मार्ग और दुर्गम हो जाएगा।

सप्त बद्री मंदिरों में भविष्य बद्री,  श्रधालुओं की कम आवाजाही के कारण अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ अछूता स्थान है । यह कैलाश पर्वत और मानसरोवर के लिए प्राचीन तीर्थ मार्ग पर स्थित है और गढ़वाल हिमालय में नीती घाटी में स्थित तपोवन से लाटा तक जाता है। वर्तमान समय में भविष्य बद्री मंदिर में नरसिम्हा की मूर्ति है, जो भगवान विष्णु का सिंह अवतार माने है I

भविष्य बद्री मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (→74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग ( 33 किलोमीटर) → चमोली (33 किलोमीटर) → जोशीमठ (29 किलोमीटर) → सालधर (19किलोमीटर) → भव्य बद्री (6 किलोमीटर पैदल यात्रा)

ध्यान बद्री मंदिर

ध्यान बद्री मंदिर आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित मंदिर है। यह पंच केदार में से एक कल्पेश्वर महादेव  के पास स्थित है जोकि चमोली जिले के उर्गम घाटी में अलकनंदा नदी के किनारे पर है I यहाँ देवदार और जामुन के घने जंगल के बीच से 12 किलोमीटर की पैदल यात्रा द्वारा पहुंचा जा सकता है।

ध्यान बद्री मंदिर से जुडी कथा के अनुसार इस स्थान पर महाभारत के योद्धा पुरुजन्य ने तपस्या करी थी। पाण्डव राजा पुरूजन्य के वंशज थे। यहाँ भगवान विष्णु की काले पत्थर से बनी चतुर्भुज ध्यान मुद्रा में बनी मूर्ति स्थापित है। भगवान् विष्णु की ध्यान मुद्रा में स्थापित मूर्ति के कारण ही इस स्थान का नाम ध्यान बद्री प्रसिद्ध हुआ है।

ध्यान बद्री के लिए यात्रा मार्ग

 ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → नंदप्रयाग (21 किलोमीटर) → पीपलकोटी (26 किलोमीटर) → हेलंग (30 किलोमीटर) → उर्गम (10 किलोमीटर) → ध्यान बद्री (2 किलोमीटर)

वृद्ध बद्री मंदिर

वृद्ध बद्री मंदिर चमोली जिले के छोटे से शहर अनिमथ में 1380 मीटर (4530 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। यहां भगवान विष्णु की पूजा एक बूढ़े व्यक्ति के रूप में की जाती है और इसलिए इसका नाम वृद्धा बद्री पड़ा है ।

वृद्ध बद्री मंदिर के बारे में किंवदंती के अनुसार, यह कहा जाता है कि नारद ने इस स्थान पर आकर भगवान विष्णु की तपस्या की । नारद की तपस्या  और भक्ति से प्रसन्न होकर  भगवान विष्णु ने बूढ़े व्यक्ति के रूप में दर्शन दिए |बाद में एक दिव्य शिल्पकार विश्वकर्मा ने उसी पुराने रूप में बद्रीनाथ की मूर्ति गढ़ी। ऐसा माना जाता है कि कलियुग की शुरुआत से पहले यहां वृद्धा बद्री की पूजा की जाती थी और बाद में बाढ़ के कारण विष्णु की मूर्ति को यहाँ से विस्थापित कर दिया गया। इसी पूर्ति को आदि शंकराचार्य ने  नर कुंड में पाया और उन्होंने ही उन्होंने विष्णु की मूर्ति को पुनः स्थापित किया।

वृद्ध बद्री मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → चमोली (33 किलोमीटर) → जोशीमठ (29 किलोमीटर) → अणिमठ (8 किलोमीटर)

मंदिर तक पहुँचने के लिए गाँव के भीतर छोटे रास्तों से 10 मिनट की पैदल दूरी के बाद मोटर योग्य सड़क के माध्यम से मंदिर पहुँचा जा सकता है।

 

अर्धबद्री मंदिर

अर्धबद्री मंदिर सप्त बद्री मंदिर समूहों में सातवाँ मंदिर है। यह मंदिर चमोली जिले में 3048 मीटर (1000 फीट) की ऊंचाई पर सोभिन के पास हेरा गांव में स्थित है। मंदिर तक गाँव की खूबसूरत पगडंडियों से गुजरते हुए पैदल यात्रा द्वारा जाया जा सकता है। अन्य मंदिरों में स्थित विष्णु मूर्तियों की तुलना में यहाँ भगवान विष्णु की छोटी मूर्ति है इस वजह से इसे अर्धबद्री कहा जाता है I अर्धबद्री को सूक्ष्म बद्री के रूप में भी जाना जाता है I

अर्धबद्री मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → चमोली (33 किलोमीटर) → जोशीमठ (29 किलोमीटर) → सोभिन (17 किलोमीटर) → अर्ध बद्री

नरसिंह बद्री

भगवान विष्णु को समर्पित एक और मंदिर जिसे पंच बद्री और सप्त बद्री समूह में नहीं रखा जाता, वह नरसिंह बद्री है, जो कि चमोली जिले के जोशीमठ में है। आदि गुरु शंकराचार्य ने इसी सर्वप्रथम इसी स्थान (जोशीमठ) पर आये थे। उन्होंने इसी स्थान पर तपस्या कर ज्ञान प्राप्त किया था। पौराणिक काल में जोशीमठ को ज्योतिर्मठ कहा जाता था। जोशीमठ शब्द ज्योतिर्मठ का ही अपभ्रंश है। भगवान विष्णु ने उन्हें नरसिंह अवतार के शांत रूप में दर्शन दिए थे, इसलिए इस स्थान को नरसिंह बद्री कहा जाता है।

नरसिंह बद्री पर एक कथा और प्रचलित है, कहते है कि यहाँ स्थापित भगवान नरसिंह की मूर्ति का एक हाथ कमजोर होता जा रहा है। जिन दिन भगवान नरसिंह की बांह टूट जायेगी उस दिन बद्रीनाथ धाम का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। तत्पश्चात कलयुग समाप्त हो जायेगा और सतयुग का पुनः आगमन होगा और भगवान बद्रीविशाल भविष्य बद्री में स्थापित हो जायेंगे। सर्दियों के दौरान, जब बद्रीनाथ में कपाट बंद हो जाता है तो वहां के  पुजारी नरसिंह बद्री मंदिर में आ जाते हैं और यहां पूजा करते हैं।

नरसिंह बद्री मंदिर के लिए यात्रा मार्ग:

ऋषिकेश → देवप्रयाग (74 किलोमीटर) → श्रीनगर (35 किलोमीटर) → रुद्रप्रयाग (32 किलोमीटर) → कर्णप्रयाग (33 किलोमीटर) → चमोली (33 किलोमीटर) → जोशीमठ (29 किलोमीटर) → नरसिंह बद्री मंदिर

भगवान विष्णु को त्रिदेव (भगवान ब्रह्मा, विष्णु और शिव) में से “संरक्षक” कहा गया है I उन्होंने गढ़वाल हिमालय में प्रकृति की गोद में सप्त बद्री मंदिरों को अपना निवास बनाया है। उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित नरसिंह बद्री मंदिर के साथ सप्त बद्री मंदिर यहाँ के समृद्ध इतिहास, पौराणिक किंवदंतियों, स्थापत्य विविधताओं और विश्वास से युक्त है जो इसकी महत्ता को और बढाता है ।

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