Gangotri

गंगोत्री धाम की यात्रा

Gangotri

पवित्र नदी गंगा को समर्पित गंगोत्री मंदिर उत्तराखंड के सीमान्त जिले उत्तरकाशी जिले में स्थित है। 3,415 मीटर (11,204 फीट) की ऊँचाई पर बसा गंगोत्री उत्तराखंड के चार धामों में से एक है। यहाँ गंगा की उद्गम धारा भागीरथी अपने पूरे जोश में बहती है जिसके चारों ओर घने देवदार के वृक्ष और बर्फ से ढकी चोटियों हैं I गंगोत्री ऐसा तीर्थ है जहाँ धार्मिक विश्वास के साथ अध्यात्मिकता एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भुद मिलन होता है।

गंगोत्री धाम स्थान गंगा नदी को समर्पित है, गंगा की मुख्य धारा भागीरथी गंगोत्री से 19 किलोमीटर दूर गौमुख से निकलती है। यहाँ इसे भागीरथी के नाम से जाना जाता है और देवप्रयाग में अलकनंदा में संगम के बाद ये गंगा के नाम से पहचानी जाती है। हालाँकि स्थानीय निवासी भागीरथी को ही गंगा कहते हैं |

गंगोत्री धाम का इतिहास और किंवदंती (मान्यताएं)  

श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, एक बार भगवान् श्री राम के पूर्वज महाराजा सगर ने अश्वमेधयज्ञ का अनुष्ठान किया I इन्द्र ने डरकर अश्वमेधयज्ञ के घोड़े को कपिलमुनि के आश्रम में बाँध दिया, ध्यानावस्थित मुनि इस बात को जान न सके। सगर के साठ हजार पुत्रों ने पृथ्वी का कोना कोना छान मारा, अन्त में कपिलमुनि के आश्रम घोड़ा बँधा देखकर वे क्रोधित हो कपिलमुनि को मारने दौड़े। तपस्या में बाधा पड़ने पर मुनि ने अपनी आँखों खोली। उनके तेज से सगर के साठ हजार पुत्र तत्काल भस्म हो गये। सगर के पौत्र अंशुमान् कपिलमुनि के आश्रम में आये तथा उनकी स्तुति की। कपिलमुनि उनके विनय से प्रसन्न होकर बोले- इनकी मुक्ति तभी हो सकती है जब गंगाजल से इनकी राख का स्पर्श हो।

अंशुमान् ने घोड़ा ले जाकर अपने पितामह महाराज सगर का यज्ञ पूरा कराया। महाराज सगर के बाद अंशुमान् राजा बने, परन्तु उन्हे अपने चाचाओं की मुक्ति की चिन्ता बनी रही। कुछ समय बाद अपने पुत्र दिलीप को राज्य का कार्यभार सौंपकर गंगा जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या करने लगे और तपस्या में ही उनका शरीरान्त भी हो गया। उसके बाद दिलीप और फिर भागीरथ ने भी अपने पिता के मार्ग का अनुसरण किया I अन्त में तीन पीढ़ियों की इस तपस्या से प्रसन्न हो पितामह ब्रह्मा गंगा को पृथ्वी लोक पर भेज दिया , परन्तु उनके प्रचंड  वेग को रोकने के लिए भगवान् शिव की आराधना की गयी जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शिव नें गंगा जी को अपनी जटाओं में रोक लिया और उसमें से एक जटा को पृथ्वी की ओर छोड़ दिया।

इस प्रकार गंगा जी पृथ्वी की ओर चलीं। अब आगे -आगे राजा भगीरथ का रथ और पीछे – पीछे गंगा जी थीं। मार्ग में जह्नु ऋषि का आश्रम पड़ा, गंगा जी उनके कमण्डलु, दण्ड, आदि बहाते हुए जानें लगीं। यह देख ऋषि ने उन्हे पी लिया। कुछ दूर जाने पर भगीरथ नें पीछे मुड़कर देखा तो गंगा जी को न देख वे ऋषि के आश्रम पर आकर उनकी वन्दना करने लगे। प्रसन्न हो ऋषि ने अपनी पुत्री बनाकर गंगा जी को दाहिने कान से निकाल दिया। इसलिए देवी गंगा ‘जाह्नवी’ नाम से भी जानी जाती हैं। भगीरथ की तपस्या से अवतरित होने के कारण उन्हे ‘भागीरथी’ भी कहा जाता है। जिस पत्थर पर भागीरथ ने ध्यान किया, उसे गंगोत्री मंदिर के पास स्थित भागीरथ शिला के नाम से जाना जाता है।

गंगा की उत्पत्ति के संबंध में एक और पौराणिक कथा है। जिसमे कहा गया है किकि गंगा एक जीवंत सुंदर महिला थी जो भगवान ब्रह्मा के कमंडल (जलपात्र) से उत्पन्न हुई थी। गंगा के जन्म को लेकर दो किस्से मौजूद हैं। एक में कहा गया है कि भगवान विष्णु अपने पुनर्जन्म वामन अवतार में राक्षस बाली से ब्रह्मांड को मुक्त करा देते हैं तब ब्रह्मा ने विष्णु के पैर धोए और उनके कमंडल में पानी एकत्र किया, जहाँ से गंगा की उत्पति हुई । एक पौराणिक कथा यह भी कहती है कि गंगा एक मानव के रूप में पृथ्वी पर आई और पांडवों के पूर्वज राजा शांतनु से विवाह किया।जिनसे उन्हें भीष्म नामक पुत्र हुआ जो महाभारत काल के महान योद्धा हुए |

ऐसा माना जाता है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से गंगा का आगमन हुआ था। यह तिथि उनके नाम पर गंगा दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है|

गंगोत्री धाम के अक्षांश और देशांतर

  • 30.98 ° उत्तर
  • 78.93 ° पूर्व

कैसे पहुंचा जाये गंगोत्री धाम

निकटतम हवाई अड्डा- जॉली ग्रांट देहरादून (276 किमी)

निकटतम रेलवे स्टेशन- ऋषिकेश (266 किमी)

ऋषिकेश → चम्बा (63 किलोमीटर) → धरासू (80 किलोमीटर) → उत्तरकाशी (32 किलोमीटर) → गंगनानी (47 किलोमीटर) → हरसिल (27 किलोमीटर) → गंगोत्री (25 किलोमीटर)

गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग 34 (NH34) के आखिरी छोर पर स्थित है| मंदिर जाने के लिए दुकानों के बीच से होता हुआ एक छोटा सा पैदल रास्ता है। बर्फ से ढकी पर्वतों की चोटियां और गंगा का पारदर्शी जल मिल कर यहां के नजारों को और अधिक सुरम्य बना देते हैं।यह पूरा राजमार्ग मंत्रमुग्ध कर देने वाले दर्शनीय स्थलों से भरपूर है|

गंगा का उद्गम स्थल गौमुख गंगोत्री मंदिर से 19 किमी दूर है और थोड़े मुश्किल पैदल मार्ग से वहां  पहुँचा जा सकता है।

कब जाना चाहिए गंगोत्री धाम?

अत्यधिक ठंडे मौसम और अधिक मात्रा में बर्फबारी गंगोत्री को केवल छह महीने के लिए सुलभ बनाती है। मंदिर के द्वार अप्रैल या मई महीने में भारतीय पंचांग के अनुसार अक्षय तृतीया में खुलते हैं| और दीवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा, अन्नकूट के पावन पर्व पर गंगोत्री मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद हो जाते हैं। गंगा की मूर्ति को शीतकालीन प्रवास के लिए  हर्षिल के पास मुखबा गांव में स्थापित किया जाता है। गंगा जी की डोली यात्रा मंदिर के कपाट खुलने और बंद होने पर बड़े धूम धाम से निकलती है जिसमे भारतीय सेना की एक टुकड़ी इसकी अगवाही करता है जिसमे आसपास के गाँव के अधिकतर श्रद्धालु शामिल होते हैं|

गर्मियां मंदिर जाने के लिए सबसे अच्छा समय है। हालांकि, अप्रैल से जून में सबसे अधिक दर्शनार्थी यहाँ आते हैं । पहाड़ी मार्ग होने के कारण बरसात में कुछ कठिनाईयां होती है और सितंबर के बाद मौसम थोड़ा ठंडा और हवा भरा होता है।

मंदिर का समय- सुबह 6:15 से दोपहर 2:00 बजे तक

                           अपराह्न 3:00 से 9:30 बजे

क्यों जाएँ गंगोत्री धाम?

गंगोत्री हिमालय के चार धामों में से एक है। अन्य तीन यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ हैं। गंगोत्री की यात्रा के बिना चार धाम यात्रा अधूरी है। यहाँ आमतौर पर यमुनोत्री के बाद दौरा किया जाता है।

देवी गंगा का वास गंगोत्री एक खूबसूरत जगह है। मंदिर के पास में बहती नदी का पारदर्शी,पवित्र और स्वच्छ जल इसे और अधिक  जीवंत बनाता है । बर्फ से ढकी चोटियों के आँचल में स्वच्छ, निर्मल और पारदर्शी पानी अपने आप में इस जगह को जादुई बना देता है। मंदिर की यात्रा के बाद पवित्र नदी में डुबकी एक साथ शांति और विश्वास पाने का एक अनुभव है।

देवदार, भोज और सेब के पेड़, पक्षियों की चहकती हुई उपस्थिति और गंगा का तेज़ प्रवाह इस जगह की सुन्दरता की गवाही देता है|

क्या है गंगोत्री धाम के आस पास घूमने की जगहें?

  • गौमुख
  • भोजवासा
  • हिमालय फ़ोटो गैलरी
  • भैरवनाथ मंदिर
  • भगीरथ शिला
  • सूर्यकुंड
  • पांडव गुफ़ा
  • डूबे हुए शिवलिंगम

Image source: patrika.com

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